संगीत साधना : जीवन पर्यंत दीवानगी से संगीत की साधना
बिलासपुर शास्त्रीय संगीत और वाद्य वादन की परंपरा को जीवित रखने वाले वरिष्ठ संगीत साधक ज्ञानदास बनर्जी आज भी पूरे समर्पण और उत्साह के साथ संगीत साधना में लगे हुए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी संगीत के प्रति दीवानगी और लगन युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। दशकों से संगीत की सेवा कर रहे ज्ञानदास बनर्जी ने न केवल अपनी कला से पहचान बनाई है, बल्कि अनेक विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देकर संगीत की विरासत को आगे बढ़ाने का कार्य भी किया है।
ज्ञानदास बनर्जी का संगीत से जुड़ाव बचपन से ही रहा है। उन्होंने तबला वादन और अन्य वाद्य यंत्रों की शिक्षा प्रतिष्ठित गुरुओं से प्राप्त की और वर्षों की कठिन साधना के बाद अपनी अलग पहचान स्थापित की। संगीत को उन्होंने केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा माना। इसी कारण वे निरंतर अभ्यास और नई पीढ़ी को मार्गदर्शन देने में सक्रिय रहते हैं।
उनके परिवार में भी संगीत का माहौल बना हुआ है और नई पीढ़ी के सदस्य इस विरासत को आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रहे हैं। घर पर नियमित रूप से संगीत की महफिलें सजती हैं, जहां शास्त्रीय गायन और वाद्य वादन का अभ्यास किया जाता है। उनके शिष्यों ने देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर गुरु का नाम रोशन किया है।
संगीत प्रेमियों का मानना है कि ज्ञानदास बनर्जी जैसे कलाकार भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के सच्चे संवाहक हैं। उनकी साधना और समर्पण यह संदेश देती है कि कला के प्रति जुनून और निरंतर अभ्यास से ही किसी भी परंपरा को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा जा सकता है।